यह मैं हूँ

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लेखक – ज़ीमेन

एक वक्त आया
जब मैंने खुद को पाया ।
मैं कभी वह था ही नहीं
जो दुनिया वाले मुझे बनाना चाहते थे ।

बहुत चिल्लाया , बहुत हाथ पैर मारे
पर किसी ने कभी सुना ही नहीं ।
अरे नहीं हूँ मैं लड़की !
क्यों नहीं समझते सब !

लोग पागल कहते हैं मुझे
कहते हैं की मुझे इलाज की ज़रूरत है ।
अरे कैसे समझाऊ सबको
यह कोई बीमारी नहीं है ।

यह मैं हूँ ।

मेरा दिल ही ऐसा है ।
मेरा दिमाग ही ऐसा है ।
मैं बचपन से ही ऐसा हूँ ।
बस तब बताने से डरता था ।

मुझे लगता था की
मुझ जैसा कोई और नहीं हैं ।
मुझमें लगता था की
मुझमें ही कोई खराबी हैं ।

पर एक दिन मुझे मुझ जैसे लोग मिले
तब थोड़ी हिम्मत आई ,
और लगा की
अकेला नहीं हूँ मैं ।

ज़िदगी अपने तरीके से जीने की लड़ाई में कई और भी लड़ रहे थे
जो जीतना चाहते थे ।
सबको बताना चाहते थे की
यह कोई बीमारी नहीं हैं ।

यह मैं हूँ ।

मेरा दिल ही ऐसा है ।
मेरा दिमाग ही ऐसा है ।
मैं बचपन से ही ऐसा हूँ ।
बस अब बताने से नहीं डरता ।


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